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Saturday, 17 June 2017
छोटी सी एक कहानी हूँ, बस यूँ ही आनी जानी हूँ
हूँ आज यहाँ कल नहीं रहूँ
किसने जाना, किससे ये कहूँ
लेकिन दिल की ये बात सुनो दोस्त किसी से कहना, मेरी अंतिम इच्छा सुन लेना
मेरी अंतिम इच्छा सुन लेना

हाँ लोग करेंगे याद मुझे, अफसोस करेंगे मुझपर
आँखों से बहा देंगे रोकर, जैसे मैं बोझ हूँ उनपर
पर तुम मुझको कोई ख्वाब बनाकर अपनी पलकों में रख लेना
लेकिन दिल की ये बात सुनो दोस्त किसी से कहना

दिल टूटेंगे भी अपनों के, इलज़ाम लगेंगे  पर मुझ पर
क्यूँ मैंने छोड़ा साथ सभी का, दो चार कदम तक चल कर
फिर भी तुम मुझको कोई दोस्त बनाकर मुश्किल राहों में चल देना
लेकिन दिल की ये बात सुनो दोस्त किसी से कहना

यूं याद करना क्यूँ साथ तुम्हारे, अभी नहीं इस पल हूँ
या भूल जाना ये कह कर, के मैं इक गुज़रा कल हूँ
करना कुछ बातें हंस कर मुझसे, मुस्कान बना कर रख लेना
लेकिन दिल की ये बात सुनो दोस्त किसी से कहना


मेरी अंतिम इच्छा सुन लेना

- Shubh
Friday, 16 June 2017



मेरे छाते की तीली से बारिश की इक बूँद, चेहरे पे जो टपकी,
तो न जाने क्यूँ वो बेवजह पानी को छपछपाना याद आ गया |

उड़ती हुई बौछारों ने कंधे को छुआ,
तो घर के आंगन में पहली बरसात का नहाना याद आ गया |

वो दुआरे के नीम का मानो खिड़की को छुपाने के लिए झुक जाना,
वो मेंढकों की टोली का हम बच्चों के सुर में सुर मिलाना,

छोटी बड़ी बूंदों को लय में गिरते देखना, लहरें बनाना,
वो पेड़ों का भी संग संग झूम जाना याद आ गया |

चिल्ला चिल्ला के दोस्तों को दूर से बुलाना, कुछ ऊट पटांग गाना,
और बूंदों के शोर में उनका कुछ न सुन पाना,

डूबी गलियाँ, इस मोहल्ले से उस मोहल्ले के रस्ते भी डूबे,
कुछ देर के लिए दोस्तों से न मिल पाना याद आ गया |

वो तूफ़ान से बेज़ार हुए नन्हे पौधे को बचाने जाना,
और दोबारा भीग जाने के लिए डांट खाना,


वो छोटे शहर की कीचड भरी सड़कें, और सड़कों पे भरे लोग,
बारिश के बाद फिर उन्ही सड़कों पर, हाथ छोड़ कर साइकिल चलाना याद आ गया |


बारिश में कहाँ आएगी आज बिजली भला ! न पढ़ने का एक और बहाना,
देर रात लालटेन में होमवर्क ख़त्म करना, और अनजाने में बालों को जलाना याद आ गया |

चाक का डब्बा और डस्टर भीगे, ब्लैकबोर्ड पे पड़ीं पानी की लकीरें,
फिर टीचर का हम सबको कोलम्बस की कहानियाँ सुनाना |

साफ़ सुथरे आसमान में होते थे बादलों के रंग बिरंगे करतब,
ये सोच कर शहरों में शाम से पहले सूरज का छिप जाना याद आ गया |

अपनी ब्रांडेड बेलीज़ को कीचड से बचाते हुए जब गाड़ी में बैठी
तो स्कूल पहुँचते पहुँचते वो जूतों में पानी भर जाना याद आ गया |

कंधे पे रखे लैपटॉप पे गिरीं कुछ पानी की बूँदें,
के अचानक हर सोमवार का ऑफिस जाना याद आ गया |

वो बचपन में खुद को कोलम्बस, सिकंदर, राजा पुरु समझना,
और आज यूँ भीड़ में गुम हो जाना याद आ गया|

-    Shubh






Tuesday, 6 June 2017


ये कैसा ठहराव, के हूँ बस मैं ही मैं
राहों ने बदली मंज़िल या भटक बस मैं ही मैं
ये कैसा ठहराव,
के हूँ बस मैं ही मैं

हैं लोग बहुत इस दुनिया में, कुछ खास मेरे अपने हैं
वादे-नाते-रिश्ते हैं, कच्चे पक्के सपने हैं
कोई तो है मैं सच कहता हूँ, नींदों से जग जाता है
फिर क्यों लगता है जगने पर,
के हूँ बस मैं ही मैं

ये कैसा ठहराव,
के हूँ बस मैं ही मैं

जाने कब कैसे कैद हो गया, कांच की इन दीवारों में
सब देख रहा हूं, खुद अनदेखा सा बन के बैठा अंधियारों में
कोई आके मुझसे कह देता, ये सज़ा तुम्हारी है
पर किसे भला दोषी ठहराऊँ
के हूँ बस मैं ही मैं

ये कैसा ठहराव,
के हूँ बस मैं ही मैं

राहों ने बदली मंज़िल, या भटक बस मैं ही मैं,
ये कैसा ठहराव !
ठहराव

समय चला,
अपनी गति से, हर पल,
किसी चोट पर, किसी जीत पर
थमा नहीं, न रुका
मगर,
जब ठहरा ये मन, सूनेपन में, तो पाया
कुछ तो है जो मुहे गतिज भी ठहरा सा लगता है|
कोई रिश्ता बंधा नहीं जो कभी कहीं परिभाषाओं में,
कोई गीत मधुर सा बचपन की टूटी फूटी आशाओं में,
और छिपी कहीं कोई बात अन कही आँखों की भाषाओँ में,
मैं चलूँ उधर,
हाँ जिधर मेरा
ये ह्रदय करे, उस ओर
मगर,
मन पे मुझको निर्बाध सदा यादों का पहरा लगता है|
कुछ तो है जो मुझे गतिज भी ठहरा सा लगता है|

कोई प्यारा सपना पलकों में जो सच के प्रहार से टूटा था,
ले नहीं सका मेरा कोमल मन प्रतिशोध कोई जो छूटा था,
या दबा हुआ कोई विचार बीज जिसमे न अंकुर फूटा था,
मैंने देखा है, दुनिया का
असीम रूप, जंजालों में,
बिखरा जीवन का आलेख
मगर,
इन अनियंत्रित सीमाओं में भी मन सिमटा सा लगता है|
कुछ तो है जो मुझे गतिज भी ठहरा सा लगता है|


Saturday, 3 June 2017


जीवन दिखता है..


जीवन दिखता है सड़कों पर, दौड भाग करते
जैसे
कुछ खोया, पाया नहीं
अनंत काल से, समय बाँध लेने की चाहत में,
आतुर से|
ओढ़े हुए अनकहे मौन की चादर,
लिए साथ में स्वार्थ और आडम्बर, कई कई संख्या में यहाँ
जीवन दिखता है सड़कों पर, दौड भाग करते|

जैसे
भूखे उदरों की ज्वाला से प्रेरित हो हो कर
लड़ते हुए खुद से या प्रकृति से, या नियति से
कुछ लेते, कुछ देते, ठेलों पर, सडको पर
फुटपाथ पर, कागज के चिथड़ों में,
टूटे हुए कांच के टुकड़ों में, खोजते हुए
कभी न मिलने वाली खुशियाँ
जीवन दिखता है सड़कों पर, दौड भाग करते

जैसे
फूल बिना खुशबू के, रंगों के
कुचले हुए से
शीशे पर पानी के छींटों से, बचपन के कुछ अंश लिए हुए
भय से पुती हुई आवाजों से हँसते, बिना कहे
अनुत्तरित, अगणित प्रश्नों को कहते
सच्चाइयों में जीते, सच को सहते
सब सो जाते हैं लेकिन
अंधकार की परतों में
जीवन दिखता है सड़कों पर, दौड भाग करते|

- Shubh


शूरवीर


आशाओं की इक डोर सदा, जो अपने हाथों में पता है
वही जीव तो मनुज मात्र से, बली विजेता बन जाता है

क्रूर काल के कर्कश स्वर जब विष भरते हैं कानो में
और विश्वासों के वृक्ष डोलने लगते हैं तूफानों में
ऐसे में भी उसे तृणों का अवलम्बन मिल जाता है
वही वीर फिर तूफानों का शाषक बन कर आता है
आशाओं की इक डोर सदा, जो अपने हाथों में पता है
वही जीव तो मनुज मात्र से, बली विजेता बन जाता है|

आशाओं की इक डोर सदा, जो अपने हाथों में पता है
वही जीव तो मनुज मात्र से, बली विजेता बन जाता है

- Shubh




चेहरा


बढ़ने दो ज़रा रौशनी को आहिस्ता,
अर्से बाद खुद को आईने में देखा है।
.
वो कहते हैं चेहरा किताबों सा होता है
हाँ आँखों में आंसुओं का हिसाब तो लिखा है,
.
यादों की ग़ज़ल है कहीं,
कहीं सपनों के नज़ारे,
.
कहीं बस स्याही के निशान हैं,
कहीं लफ़्ज़ों का सैलाब लिखा है।
.
कुछ मुड़े हुए पन्नों में,
टूटा हुआ रुआब लिखा है,
.
सच है ज़िन्दगी का कोई मतलब तो न मिला,
पर मुस्कुराने का सबब बेहिसाब लिखा है।
.
ताज़ा लगते हैं कुछ किस्से अभी भी,
कुछ सवालों का न अब तक कहीं जवाब लिखा है।
.
कितनी कहानियां हैं एक किताब में,
हर कहानी ने खुद का एक किरदार लिखा है,
.
याद हैं वो खिड़की से झांकते गुलमोहर,
दिल पे आज भी हौसला तैयार लिखा है।
.
संवार लूँ थोडा इस चेहरे को आज,
के हर पन्ने के आखिर में किसी का प्यार लिखा है।

- Shubh